Thursday, August 28, 2008

महेला पर भारी माही



आखिरकार भारत ने श्रीलंका को उसकी ही ज़मीन पर मात दे ही दी ५ मैंचों की सीरीज़ पर कब्ज़ा जमा लिया लेकिन इसे जीत के कई मायेने है सबसे पहले भारत को यहाँ २३ साल के बाद जीत नसीब हुई है दूसरी इसे जीत की उम्मीद किसी ने नही की थी तीसरी ये जंग थी दो कप्तानों की


माही ने जीत कर ये साबित किया है की अगर तन मन से खेला जाए तो कुछ भी सम्भव है


२३ साल बाद मिली जीत का सवाद कैसा होता है


खुशी में झूमते इन खिलाडिओं को ही पता है की उन्हें कैसा महसूस हो रहा है कैसा लग रहा है लंका में डंका बजा कर कैसा लग रहा है मुरली मेंडिस जो पुरे टेस्ट सीरीज़ में भारतीय बलेबजों को नाचते रहे की पहेली सोल्वे कर के


शुरुआत रैना से ख़तम रैना पर


सनाथ जयसुरिया जब ताबड़ तोड़ बल्ला चला रहे थे तो लग रहा था की २५८ का स्कोर भी कम पर जाएगा तभी हरभजन ने गेंद पकड़ा ओर गेंदे फेकते ही स्लिप में खड़े रैना के बायीं ओर उछली रैना ने उसे छोड़ते छोड़ते लपक लिया इस तरह लंकाई परी फिर कभी नही सभाल सकी


मिडविकेट पर जैसे ही रैना ने थिलन तुषारा का कैच पकड़ा सीरीज़ भारत की मुठी में आ गए फिर क्या था इस तरह सनाथ के कैच से धराशायी होने का सिलसिला रैना के अन्तिम कैच लेने के साथ ही थमा तो ज़रूर लेकिन तब तक भारत जीत चुका था ७६ रन बनाने वाले ओर दो कैच लेने वाले रैना को इसका श्रेय भी मिला ओर उन्हें मन ऑफ़ मैच का पुरस्कार भी मिला



भारतीय उपमहाद्वीप में कौन है बेहतर कप्तान


एकतरफ भरी भरकम एक्सपेरिएंस वाले श्रीलंकाई कप्तान ओर दूसरी तरफ़ हाल ही में ति२० वर्ल्ड कप ओर ऑस्ट्रेलिया को उसी के घर में मात देने वाले माही हर जीत पर हो हल्ला मचने वाली मीडिया ने इस बात पर धयान नही दिया की ये मुकाबला है दो कप्तानों का


टेस्ट सीरीज़ में हार के बाद श्रीलंका आए माही पर दबाव था मुरली मेंडिस से निपटने का क्योंकि लंकाई कप्तान ने इन्ही तुरुप के पत्तों के सहारे भारतीय बल्लेबाजों को नचाया था ओर महेला ने एक बार फिर इन्ही तुरुप के इको के सहारे माही को चित करने की बिसात बिछाई थी


लेकिन कंप्यूटर की तरह हर वक्त चौकस रहने वाले माही ने तोड़ दिया इन रहस्मई गेंदबाजों के तिलिस्म को पुरे सीरीज़ के दोरान ये दोनों गेंदबाज़ कभी विकेट लेने तो कभी रन बचने की जुगत में लगे रहे


माही ने जिस अंदाज़ में बेकाबू हो चुके इन श्रीलंकाई चीतों पर लगाम लगाया जीत की बुनियाद वही पड़ गई थी फिर क्या था भारतीय बल्लेबाजों ने बहुत आसानी से इनको खेला ओर जीत हासिल की


इसके साथ ही महेला के अहम् को तोड़ते हुए माही ने सीरीज़ पर हाथ साफ़ कर लिया








मिद्विक्केट



ये भारत के इन खिलाडिओं से पूछे ओर इनसे ये भी पुचा जाए की



Thursday, August 14, 2008

बिंद्रा के बहाने


फईनल राउंड का आखरी शोट देखने वालों की धरकनें ज़ोर से धरक रही थी अभिब्नव समेत सभी शूटर्स आखरी शोट देने के लिए तैयार थे दुसरे नम्बर चल रहे बिंद्रा का कम से कम ब्रोंज़े मैडल के लिए पक्का हो चुका था लेकिन यहाँ संघर्ष गोल्ड के था बिंद्रा ने निशाना साधा और निशाना १०० परसेंट लगा बगल में निशाना लगाने को तैयार फिनलैंड के शूटर ने गोल्ड पाने की आस छोड़ दी चाइनीज शूटर के पसीने छुट गए-----ओर भारत को १०८ साल के ओल्युम्पिक इतिहास में पहली बार गोल्ड मैडल मिला-----

बिंद्रा बहादुर के इस हैरतंगेज़ कारनामे ने पुरे देश वासियों का दिल जीत लिया है ओर अब ये सवाल उठ रहा है की क्या इस गोल्ड मैडल से वाकई भारतीय खिलाड़ीयों को कोई फायेदा होने वाला है जी हाँ याहाँ खिलाड़ियों के फायेदे की बात इस लिए की जा रही है क्योंकि ये वो बिरादरी है जिसे हर ओल्युम्पिक के बाद हमारे देश वासी सवालों के घेरें में खड़ा करते हैं इस दौरान हमरे खेल प्रशाआसक साफ़ साफ़ बच निकलते हैं-----यही नही उनका गुषा भी खिलाड़ियों पर ही उतरता है

इसकइ मिसाल के लिए ज्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नही मोनिका देवी हैं जिन्हें साईं ने डोपिंग पोसोतिवे पाए जीने की वजह से ओल्युम्पिक जाने से ठीक पहले रोक दिया-----इसे बात की जांच होनी चाहिए हर कसूरवार को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए क्योंकि ये तोह मोनिका देवी का केस था जो बाहर आ गए नही तो हमारे खेल प्रशासन की निकम्माप्bahar hi nahi aa pati kyonki ham apna sara gushsha khiladiyon par nikaal dete hain


khair Baat Abhinav bindra ki-----unke success ne ye sabit kar diya ki Bhartiye kisi se kam nahi aor itne nikamme prashasakon ke wabjud unme medal jitne ki capacity है---उनकी इस सफलता हमें ये यकीं दिलाया है की दुसरे एरिया की तरह स्पोर्ट्स में भी हम कामयाबी हासिल जर सकते हैं ----बशर्ते हमखिलाड़ियों के साथ साथ एडमिनिस्ट्रेशन पर भी धयान दे -----इनकी जवाबदेही तय करें इनसे पूछे की येइसी क्या वजह थी की उन्होंने मोनिका देवी को ओल्युम्पिक में जाने नही diya beshak monica medal jite ya na jiye lekin iske liye char saal ki mehnat kyon jaya jaane diya gaya क्यों सुरेश कलमाडी ओल्युम्पिक असोसिएशन के गद्दी से चिपके पड़े हैं बिना किसी जवाबदेही के

हमारे खिलाड़ियों ने हमेशा अच्छा प्रदर्शन कर हमें याद दिलाने की कोशिश की है की खेल प्रशासकों की ज़जीरें उन्हें जकडे हुई हैं हमें बचो लेकिन ये हमारी नीरअसता hai की हम उनकी आवाज़ नही सुनते


नही सुनते की इतनी असफलता कऐ वाबजूद कलमाडी जैसे लोगों की कोई जवाबदेही नही है क्या कलमाडी जैसों के बिना ओल्युम्पिक असोसिएशन नही चल सकता हमें इस बात की ज़रूरत है की हम कलमाडी जैसे लोगों को बिंद्रा की सफलता की क्रेडिट ना लेने दे क्योंकि इसमे इनका कोई योगदान नही है Bindra

की सफलता का सबक यही है की हम अपने खिलाड़ियों के पीछे खड़ा रहना सीखें----उन्हें ये बिस्वास दे की पुरा देश उनके पीछे खड़ा है फिर ओल्युम्पिक असोसिएशन में निकम्मों की फौज हो या ना हो हम मेदल्स जीतेंगे

हम ये तय कर ले की हमें असोसिएशन के yeyashi ka adda nahi ise bannaya gaya hai khiladion ke hiton ki raksha karne ke liye. agar aisa wo nahi kar sakte to istifa den aor khiladiyon ko mauka de wo khud sab kuch manage kar lenge khel ko bhi aor khud ko bhi


aaye hum Bharat ke 61 independence day par ye thane ki olyumpic assocation ko nikammon ki fauj se mukt karayenge